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Thursday, 16 April 2026

विधायक अभय सिंह हुए बरी

 

वाराणसी। यूपी: पूर्व सांसद धनंजय सिंह को झटका, विधायक अभय सिंह बरी: 24 साल पुराने टकसाल कांड में वाराणसी कोर्ट का फैसला, फायरिंग का आरोप था

वाराणसी। एमपी-एमएलए कोर्ट ने बुधवार को विधायक अभय सिंह और मिर्जापुर के MLC विनीत सिंह समेत सभी 6 आरोपियों को बरी कर दिया है। धनंजय ने आरोप लगाया था कि अभय और विनीत सिंह ने अपने 4-5 साथियों के साथ उनके काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग की थी। इसमें वह, उनके गनर, चालक समेत कई लोग घायल हो गए थे।


जजमेंट से पहले मंगलवार रात धनंजय सिंह ने बाबा विश्वनाथ मंदिर में माथा टेका और रुद्राभिषेक किया। कालभैरव मंदिर में भी दर्शन-पूजन किया।


उन्होंने कहा था-


हमें न्याय जरूर मिलेगा। अभय सिंह से छात्र राजनीति के दौरान से ही रंजिश है। वह कई बार मुझे मारने की कोशिश कर चुका है। मैंने अभय और उसके साथियों को पहचाना और कोर्ट में गवाही दी।


13 अप्रैल को ही विशेष न्यायाधीश (एमपी-एमएलए कोर्ट) यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। फैसले को लेकर कोर्ट और आसपास के इलाकों की सुरक्षा बढ़ा दी गई। 2 IPS, 3 ACP समेत 350 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात रहे। एक कंपनी PAC भी बुलाई गई।


4 अक्टूबर, 2002 को पूर्व सांसद धनंजय सिंह अपने साथियों के साथ सफारी गाड़ी में बैठकर वाराणसी से जौनपुर लौट रहे थे। उस समय वे जौनपुर की रारी सीट से निर्दलीय विधायक थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि जब वह कैंट थाना क्षेत्र के नदेसर में टकसाल सिनेमा हॉल के पास पहुंचे, तभी बोलेरो सवार अभय सिंह और उनके 4-5 साथियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।

हमले में धनंजय, उनके गनर, चालक समेत कई लोग घायल हो गए। घायलों को मलदहिया के सिंह मेडिकल में भर्ती कराया गया था, जबकि हमलावर मौके से फरार हो गए थे। मामले में धनंजय ने अभय सिंह, विनीत सिंह (वर्तमान MLC), संदीप सिंह, संजय सिंह, विनोद सिंह और सतेंद्र सिंह बबलू के खिलाफ नदेसर थाने में मुकदमा दर्ज कराया था।

पुलिस ने संदीप सिंह, संजय रघुवंशी, विनोद सिंह और सतेंद्र सिंह बबलू के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया था। हालांकि, 29 अगस्त 2025 को अपर जिला जज सुशील खरवार ने गैंगस्टर एक्ट मामले में आरोपियों को बरी कर दिया था।


धनंजय और अभय, जिगरी यार से जानी दुश्मन कैसे बने, 5 पॉइंट में पढ़िए


1- मौसी का लड़का बोलकर अभय ने धनंजय को दिलाया था हॉस्टल


अभय सिंह के मुताबिक, 1992 में जौनपुर के कर्रा कॉलेज से पढ़कर निकले धनंजय सिंह की मुलाकात पहली बार तिलकधारी सिंह कॉलेज के अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह ने कराई थी। दशहरा का दिन था। तब उन्होंने ही कहा था कि धनंजय भी लखनऊ में पढ़ने के लिए जा रहे, इनकी मदद करना।


अभय सिंह के मुताबिक, धनंजय का एडमिशन उनके जिगरी दोस्त पीयूष सिंह ने कराया था। पीयूष भी लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। हालांकि, धनंजय सिंह एडमिशन की कहानी खुद बता चुके हैं। उनके मुताबिक, तब प्रवेश इंट्रेंस एग्जाम से होता था। वे प्रयागराज और लखनऊ दोनों यूनिवर्सिटी में इंट्रेंस टेस्ट में पास हुए थे, लेकिन उन्होंने प्रवेश का निर्णय लखनऊ यूनिवर्सिटी में लिया था।


लखनऊ यूनिवर्सिटी में अभय सिंह, धनंजय सिंह से पढ़ाई में एक साल सीनियर थे। वे पहले से हॉस्टल में रूम नंबर- 51 में रहते थे। उन्होंने हॉस्टल वार्डन से झूठ बोला कि धनंजय उनकी मौसी के लड़के हैं। इसके बाद धनंजय सिंह को अभय सिंह वाले हॉस्टल में नीचे का कमरा नंबर-18 अलॉट हुआ था।


2- कॉलेज में मशहूर थी तीनों की दोस्ती जौनपुर के ही अरुण उपाध्याय भी लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। छात्र राजनीति में सक्रिय थे। जौनपुर से जुड़ाव के चलते अभय और धनंजय की उनसे दोस्ती थी। अभय सिंह के मुताबिक, उनका सपना यूपीएससी क्वालीफाई करने का था। वहीं, धनंजय सिंह कहते हैं कि उनका सपने शुरू से दो ही थे, पहला फौज में जाने का और रिटायरमेंट लेकर राजनीति करने का। ये तीनों की तिकड़ी यूनिवर्सिटी कैंपस में मशहूर हो गई।


मंडल आंदोलन के खिलाफ प्रदर्शनों में तीनों साथ दिखते। तब लखनऊ यूनिवर्सिटी का दबदबा पूरे प्रदेश में था। अरुण उपाध्याय महामंत्री के चुनाव की तैयारी कर रहे थे। 2002 तक उनकी दोस्ती रही। इसके बाद उनके रिश्तों में तल्खी आने लगी। 2002 में धनंजय सिंह पर बनारस में जानलेवा हमला होता है। धनंजय सिंह ने एफआईआर दर्ज कराते हुए अपने जिगरी दोस्त रहे अभय सिंह को आरोपी बनाया।


3- दोनों को बाहुबली का तमगा कैसे मिला जौनपुर के पूर्व सांसद धनंजय सिंह और अयोध्या के गोसाईंगंज से विधायक अभय सिंह की राजनीति में पहचान बाहुबली नेता की है। धनंजय सिंह ने दैनिक भास्कर के साथ इंटरव्यू में दावा किया था कि अभय सिंह से मिलने के बाद उनके हर केस में मैं भी मुल्जिम बनता गया। बाद में राजनीति में सक्रिय हुआ तो राजनीतिक कारणों से मुकदमे लदते चले गए।


वहीं, अभय सिंह दावा करते हैं कि अरुण उपाध्याय के छात्र चुनाव से पहले मेरे ऊपर सिर्फ एक मारपीट का मुकदमा दर्ज हुआ था। इसके बाद सारे मुकदमे दर्ज हुए। कई मुकदमे बिना अपराध के भी दर्ज हुए। कई में धनंजय सिंह के अपराध में मुझे भी आरोपी बनाया गया।


4- 1996 में अभय गए जेल, धनंजय हुए फरार 1996 में हेमंत सिंह का मर्डर हुआ। उस समय लखनऊ में तत्कालीन एसएसपी सूर्य कुमार शुक्ला ने अभय और धनंजय दोनों को मुल्जिम बनाया। हालांकि, अभय सिंह दावा करते हैं कि हम दोनों को इस केस में झूठा फंसाया गया था। 11 जनवरी 1996 में ही अभय सिंह हत्या के प्रयास मामले में दर्ज एक केस में जेल चले गए तो साढ़े 4 साल वहां में रहे। धनंजय सिंह फरवरी, 1999 तक फरार रहे।


5- जेल में हुआ विवाद, दोनों की राहें अलग हुईं फरवरी, 1999 में धनंजय के सरेंडर करने के बाद अभय से मुलाकात जेल में हुई। वहां दोनों के बीच पुरानी घटनाओं, टेंडर की रकम और संतोष और अभिषेक के मर्डर को लेकर विवाद हुआ। वहीं से दोनों की राहें अलग हो गईं। 2000 में अभ।य जमानत पर बाहर निकले।


जेल में उनकी मुलाकात नसीमुद्दीन सिद्दीकी से हुई थी। उनके माध्यम से अभय सिंह को बसपा से पहली बार 2002 में विधायकी का टिकट मिला। लेकिन हार गए। वहीं, धनंजय सिंह 2002 में रारी विधानसभा निर्दलीय चुनाव में उतरे और जीत गए।


4 अक्टूबर, 2002 धनंजय सिंह के काफिले पर हमला हुआ। धनंजय ने अभय के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया, तब से दोनों की राहें अलग हो गईं। जब भी मौका मिलता है, एक-दूसरे पर आरोपों की बौछार करते रहते हैं। कोडीन कफ सिरप में जब धनंजय के करीबी आलोक सिंह और मनीष सिंह टाटा पकड़े गए, तब भी अभय ने कोडीन भैया कहकर तंज कसा था।

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